कम समय में हेमा नेगी ने हासिल किया गायिकी के क्षेत्र में बड़ा मुकाम,अब मिलेगा देश का प्रतिष्ठित सम्मान



कम समय में हेमा नेगी करासी ने हासिल किया बड़ा मुकाम, अब मिलेगा देश प्रतिष्ठित ‘संगीत नाटक अकादमी युवा पुरस्कार: सोशल मीडिया पर लगा बधाई देने वालों का तांता

जागर मांगलों से बनाई हेमा ने बनाई अलग पहचान
देश विदेशों के प्रतिष्ठित मंचों पर दी अपनी प्रस्तुतियां

संघर्ष से सफलता का शिखर: उत्तराखंड की ” हेमा नेगी करासी को मिलेगा प्रतिष्ठित ‘संगीत नाटक अकादमी युवा पुरस्कार’
देवभूमि उत्तराखंड की लोक-संस्कृति को सात समंदर पार एक नई पहचान दिलाने वाली प्रख्यात लोक-गायिका और संस्कृति संरक्षक हेमा नेगी करासी को वर्ष 2024 के प्रतिष्ठित “संगीत नाटक अकादमी युवा पुरस्कार” से सम्मानित किया गया है। यह पुरस्कार उन्हें उत्तराखंड की समृद्ध लोक-कला, पारंपरिक विधाओं और संगीत के क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट एवं उल्लेखनीय योगदान के लिए दिया गया है। इस राष्ट्रीय सम्मान के बाद पूरे उत्तराखंड और प्रवासी उत्तराखंडियों में खुशी की लहर है।
तानों से राष्ट्रीय सम्मान तक का सफर (जीवन परिचय और संघर्ष)
रुद्रप्रयाग जनपद के दूरस्थ गांव तुखिंडा में जन्मी हेमा नेगी करासी का यह सफर बिल्कुल आसान नहीं था। विवाह के बाद उनका ससुराल फलासी गांव में हुआ। एक साधारण परिवार से निकलकर राष्ट्रीय पटल पर छा जाने के पीछे उनका एक लंबा और कड़ा संघर्ष छिपा है।
शुरुआत के दिनों में जब उन्होंने उत्तराखंड की पारंपरिक वेशभूषा (पाखला-आंगड़ी और पहाड़ी नथ) को पहनकर मंच पर आना शुरू किया, तो कई रूढ़िवादी सोच वाले लोगों ने उन पर तंज कसे और उनके पहनावे का उपहास उड़ाया। रास्ते में कई आर्थिक और सामाजिक दिक्कतें आईं, लेकिन हेमा जी ने कभी हार नहीं मानी।
उन्होंने अपनी कड़ी मेहनत, अटूट साधना और माटी के प्रति अगाध प्रेम से उन सभी चुनौतियों को पीछे छोड़ दिया। आज वही पारंपरिक परिधान, जिसके लिए कभी लोगों ने उंगलियां उठाई थीं, हेमा जी की बदौलत देवभूमि की लोक-विरासत का अंतरराष्ट्रीय सिंबल बन चुका है।
लुप्तप्राय लोक-विधाओं को दिया नव-जीवनदान
हेमा नेगी करासी सिर्फ एक गायिका नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक योद्धा हैं। उन्होंने उत्तराखंड की उन विधाओं को सहेजने का बीड़ा उठाया जो आधुनिकता की चकाचौंध में दम तोड़ रही थीं। उन्होंने जागर, थड़िया, चौंफला और झुमेलो जैसी लुप्तप्राय लोक-विरासत को न सिर्फ पुनर्जीवित किया, बल्कि अपनी जादुई आवाज और आधुनिक संगीत के अनूठे संगम से इसे आज की युवा पीढ़ी की धड़कन बना दिया।
हेमा जी की कला-साधना का ही असर है कि आज देश ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी उत्तराखंडी लोक-संगीत को बेहद सम्मान से सुना जाता है। उनके हर स्वर में मानो अलकनंदा की निर्मल धारा बहती है। संघर्षों की तपती धूप में खुद को तपाकर उन्होंने खुद को एक ‘कुंदन’ के रूप में स्थापित किया है।
तीलू रौतेली पुरस्कार से भी हो चुकी हैं सम्मानित
उत्तराखंड सरकार द्वारा अदम्य साहस, संघर्ष और समाज व संस्कृति के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाली राज्य की असाधारण महिलाओं को दिया जाने वाला सर्वोच्च ‘तीलू रौतेली पुरस्कार’, जिससे हेमा जी को पिछले वर्ष ही नवाजा गया था।
संगीत नाटक अकादमी का यह ‘युवा पुरस्कार’ इस बात का प्रमाण है कि यदि जड़ों के प्रति समर्पण सच्चा हो, तो माटी की हुंकार को आसमान छूने से कोई नहीं रोक सकता। हेमा नेगी करासी आज उत्तराखंड के सांस्कृतिक स्वाभिमान का सर्वोच्च शिखर हैं।
