August 18, 2026

धामी सरकार की नई सोच—आपदा प्रबंधन में अब मानसिक स्वास्थ्य सुरक्षा को भी मिलेगी प्राथमिकता

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धामी सरकार की नई सोच—आपदा प्रबंधन में अब मानसिक स्वास्थ्य सुरक्षा को भी मिलेगी प्राथमिकता

आपदा प्रभावितों के मनोबल को मजबूत करेगा उत्तराखंड स्वास्थ्य विभाग, निमहांस-बेंगलुरू के सहयोग से स्वास्थ्यकर्मियों को मिलेगा विशेष प्रशिक्षण

हर जिले में ऐसे स्वास्थ्यकर्मी तैयार होंगे जो आपदाग्रस्त लोगों के मन के घाव भी भरेंगे : डॉ. आर. राजेश कुमार

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पिछले कुछ समय से उत्तराखंड लगातार प्राकृतिक आपदाओं की मार झेल रहा है । कहीं भूस्खलन, कहीं बादल फटना तो कहीं अत्यधिक वर्षा के कारण जन–जीवन अस्त-व्यस्त हो रहा है। इन आपदाओं ने न केवल राज्य की भौतिक संरचना को प्रभावित किया है, बल्कि लोगों के मानसिक स्वास्थ्य और मनोस्थिति पर भी गहरा प्रभाव डाला है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और स्वास्थ्य मंत्री डॉ. धन सिंह रावत के दिशा–निर्देशों के बाद इस चुनौती को गंभीरता से लेते हुए स्वास्थ्य सचिव डॉ. आर. राजेश कुमार ने आपदाओं के दौरान मानसिक स्वास्थ्य सुरक्षा को लेकर राज्य में एक महत्वपूर्ण पहल शुरू की है। इस पहल के तहत राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग, उत्तराखंड द्वारा भारत सरकार और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेज (निमहांस), बेंगलुरू के सहयोग से राज्यभर के स्वास्थ्यकर्मियों को विशेष प्रशिक्षण दिया जा रहा है, ताकि वे आपदा के दौरान और उसके बाद प्रभावित लोगों को मानसिक स्वास्थ्य एवं मनोसामाजिक सहायता सेवाएँ प्रदान कर सकें। इस प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ स्वास्थ्य विभाग के चंदर नगर स्थित प्रशिक्षण केंद्र, देहरादून में किया गया।

 

*तीन चरणों में होगा प्रशिक्षण कार्यक्रम*

कार्यक्रम तीन चरणों में आयोजित किया जा रहा है —

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प्रथम बैच: जनपद देहरादून

द्वितीय बैच: जनपद पौड़ी गढ़वाल

तृतीय बैच: जनपद नैनीताल

 

अगले दो महीनों में प्रदेशभर से लगभग 100 स्वास्थ्यकर्मियों को प्रशिक्षित किया जाएगा। इनमें मनोचिकित्सक, चिकित्सा अधिकारी, सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी, काउंसलर और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हैं। ये प्रशिक्षित कर्मी जिला और ब्लॉक स्तर पर जाकर आपदा प्रभावित परिवारों को मानसिक स्वास्थ्य सहायता प्रदान करेंगे।

 

*आपदा संवेदनशील राज्य के लिए दूरदर्शी कदम*

उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियाँ इसे देश के सबसे अधिक आपदा संवेदनशील प्रदेशों में रखती हैं। राज्य में आए दिन अत्यधिक वर्षा, भूस्खलन, बादल फटना और सड़क क्षति जैसी घटनाएँ आम हो चुकी हैं। इस वर्ष धराली क्षेत्र में बादल फटने से आई भीषण आपदा ने एक बार फिर यह साबित किया कि ऐसी स्थितियों में केवल भौतिक पुनर्वास पर्याप्त नहीं है। इन घटनाओं में जहाँ जान–माल की हानि होती है, वहीं प्रभावित परिवारों में अवसाद, चिंता, भय और असुरक्षा की भावना गहराई से बैठ जाती है। स्वास्थ्य विभाग ने बीते वर्षों में प्रभावित क्षेत्रों तक प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएँ पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, और अब यह प्रशिक्षण कार्यक्रम आपदा प्रबंधन को मनोवैज्ञानिक पुनर्वास से भी जोड़ने की दिशा में निर्णायक कदम साबित होगा।

 

*स्वास्थ्य सचिव डॉ. आर. राजेश कुमार का बयान*

स्वास्थ्य सचिव डॉ. आर. राजेश कुमार ने कहा मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी जी और स्वास्थ्य मंत्री डॉ. धन सिंह रावत जी के मार्गदर्शन में स्वास्थ्य विभाग आपदा प्रबंधन के मानवीय पहलू पर विशेष ध्यान दे रहा है। आपदाओं में सिर्फ घर और जीवन नहीं टूटते, बल्कि मन भी टूटते हैं। हमारा लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि उत्तराखंड के हर जिले में ऐसे प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी हों जो न केवल चिकित्सा सहायता दें, बल्कि लोगों की भावनात्मक पीड़ा को भी समझें और उन्हें मानसिक रूप से सशक्त बनाएं। निमहांस, बेंगलुरू के सहयोग से यह प्रशिक्षण कार्यक्रम राज्य के स्वास्थ्य तंत्र को नई मजबूती और संवेदनशीलता प्रदान करेगा। स्वास्थ्य सचिव डॉ. आर. राजेश कुमार ने कहा पहल न केवल आपदा प्रभावित समुदायों के मनोबल को पुनर्स्थापित करेगी, बल्कि यह राज्य को मानसिक स्वास्थ्य सुरक्षा के क्षेत्र में अग्रणी प्रदेश के रूप में स्थापित करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम है। अब राज्य में आपदा राहत का अर्थ केवल भौतिक पुनर्वास नहीं रहेगा बल्कि “मन की शांति और मानसिक सुरक्षा” भी इस प्रक्रिया का अभिन्न हिस्सा होगी।

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*प्रशिक्षण का उद्देश्य और महत्व*

इस प्रशिक्षण कार्यक्रम का उद्देश्य आपदाओं के समय मानसिक स्वास्थ्य पुनर्निर्माण को स्वास्थ्य सेवा का अभिन्न हिस्सा बनाना है। भारत सरकार और निमहांस, बेंगलुरू के विशेषज्ञ प्रशिक्षकों द्वारा स्वास्थ्यकर्मियों को यह सिखाया जा रहा है कि आपदा के बाद पीड़ित व्यक्ति से संवाद कैसे स्थापित किया जाए। तनाव, आघात, अवसाद और भय जैसी मनोवैज्ञानिक स्थितियों की पहचान कैसे की जाए। समुदाय आधारित परामर्श और सामूहिक समर्थन तंत्र कैसे विकसित किया जाए। आपदा प्रभावित समुदायों में लचीलापन (resilience) कैसे बढ़ाया जाए। प्रशिक्षण के उपरांत सभी प्रतिभागियों को राज्यस्तरीय मानसिक स्वास्थ्य आपदा प्रतिक्रिया नेटवर्क का हिस्सा बनाया जाएगा, ताकि किसी भी आपात स्थिति में वे तत्काल राहत कार्यों के साथ मनोसामाजिक सहायता भी प्रदान कर सकें।

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*शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक घावों को भरना भी जरूरी- डॉ. सुनीता टम्टा*

कार्यक्रम का शुभारंभ डॉ. सुनीता टम्टा, महानिदेशक, चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण ने किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा उत्तराखंड की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए यहाँ आपदाएँ अपरिहार्य हैं। इन आपदाओं के बाद केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक घावों को भरना भी उतना ही जरूरी है। यह पहल राज्य के आपदा प्रबंधन तंत्र को और अधिक मानवीय और प्रभावी बनाएगी। इस अवसर पर डॉ. शिखा जंगपांगी, निदेशक चिकित्सा स्वास्थ्य एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी, राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण, उत्तराखंड; डॉ. सुनीता चुफाल, प्राचार्य प्रशिक्षण केंद्र; डॉ. संजीव कुमार मणिकप्पा एवं डॉ. अनिल (निमहांस, बेंगलुरू) के साथ डॉ. सुमित देव बर्मन, डॉ. विमलेश जोशी, डॉ. सुजाता और डॉ. पंकज सिंह भी उपस्थित रहे।

 

*भविष्य के लिए सशक्त स्वास्थ्य तंत्र की दिशा में कदम*

स्वास्थ्य विभाग का लक्ष्य इस पहल को राज्य के सभी जिलों तक विस्तारित करने का है। निकट भविष्य में हर जिले में मानसिक स्वास्थ्य आपदा प्रतिक्रिया टीम (Mental Health Response Team) गठित की जाएगी, जो किसी भी आपदा की स्थिति में तत्काल राहत और परामर्श सेवाएँ प्रदान करेगी। राज्य सरकार इस पहल को निमहांस बेंगलुरू के साथ दीर्घकालिक सहयोग में बदलने की दिशा में कार्य कर रही है, जिससे उत्तराखंड मनोसामाजिक आपदा प्रबंधन का राष्ट्रीय मॉडल बन सके।

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