25 साल बाद भी अपने अधिकारों के लिए छटपटा रहा उत्तराखंड: जगदीश ममगाईं



25 साल बाद भी अपने अधिकारों के लिए छटपटा रहा उत्तराखंड: जगदीश ममगाईं
‘स्वाधिकार के लिए छटपटाता उत्तराखंड’ किताब का विमोचन, हरीश रावत बोले – गवर्नेंस का मॉडल ही नहीं बना
देहरादून। पृथक उत्तराखंड राज्य को बने 25 साल पूरे हो चुके हैं, लेकिन राज्य आज भी अपनी संपत्ति, परिसंपत्तियों और राजस्व अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहा है। यह कहना है राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन के राष्ट्रीय सह-संयोजक और राज्य आंदोलनकारी नेता जगदीश ममगांई का। ममगांई की पुस्तक _‘स्वाधिकार के लिए छटपटाता उत्तराखंड’_ का विमोचन शनिवार को उत्तरांचल प्रेस क्लब, देहरादून में पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री हरीश रावत ने किया।
भावना से बना राज्य, गवर्नेंस की तैयारी नहीं’
किताब विमोचन के मौके पर हरीश रावत ने कहा कि उत्तराखंड राज्य तो बन गया, लेकिन मॉडल ऑफ गवर्नेंस पर कोई तैयारी नहीं थी।
“अपनी सरकार तो बन गई, लेकिन प्रशासन और शासन की दिशा ही तय नहीं कर पाए। भावना के आधार पर आंदोलन परवान चढ़ा। 27 प्रतिशत आरक्षण से उपजा असंतोष और मुजफ्फरनगर कांड के बाद यह साफ हो गया कि अलग राज्य ही एकमात्र विकल्प है। कांग्रेस नेतृत्व और अटल बिहारी वाजपेयी के सहयोग से राज्य का सपना साकार हुआ,” हरीश रावत ने यह भी स्वीकार किया कि उत्तराखंड राज्य पुनर्गठन अधिनियम बनते समय राज्य के तत्कालीन प्रतिनिधि चूक गए, जिससे अधिकारों के बंटवारे में नुकसान हुआ।
ममगाईं का आरोप – 25 साल बाद भी यूपी के कब्जे में परिसंपत्तियां
लेखक जगदीश ममगांई ने कहा कि 25 साल बाद भी उत्तराखंड को अपनी संपत्ति और राजस्व पर पूर्ण अधिकार नहीं मिला है।
“राज्य बनते ही परिसंपत्तियों का बंटवारा होना चाहिए था, लेकिन पुनर्गठन अधिनियम में ऐसे प्रावधान किए गए कि आवास-विकास, सिंचाई भूमि, नहरें, पेयजल, विद्युत, वन, परिवहन, पर्यटन, कृषि जैसी संपत्तियों पर आज भी उत्तर प्रदेश का कब्जा है। हरिद्वार का कुंभ और कांवड़ मेला क्षेत्र तक हस्तांतरित नहीं किया गया,” उन्होंने कहा।
मगांई के अनुसार जलविद्युत परियोजनाओं, बांधों और जल संयत्रों पर केंद्र और उत्तर प्रदेश का अधिकार है, जबकि जमीन अधिग्रहण, विस्थापन और आपदा का दंश उत्तराखंड झेल रहा है।
पलायन, बेरोजगारी और बाहरी हस्तक्षेप पर उठाए सवाल
ममगांई ने कहा कि पृथक राज्य से पहले ‘पानी और जवानी’ को उत्तराखंड की पूंजी बताया जाता था, लेकिन जलविद्युत परियोजनाओं पर गंगा जल प्रबंधन बोर्ड के जरिये केंद्र और यूपी ने कब्जा कर लिया।
उन्होंने आरोप लगाया कि हजारों सरकारी पद खाली हैं, लेकिन नौकरियों पर बाहरी लोग फर्जी दस्तावेजों से कब्जा कर रहे हैं। “हर विभाग में बाहरी लोगों की नियुक्ति हो रही है। सरकारी नौकरियां पैसे लेकर बेचने का धंधा चल रहा है,” ममगांई ने कहा।
पहाड़ खाली, मैदान भर रहे – परिसीमन से मिट सकता है आंदोलन का मकसद
लेखक ने चिंता जताई कि 2026 की जनगणना के बाद होने वाले परिसीमन में पहाड़ी जिलों की विधानसभा सीटें 24-25 रह जाएंगी, जबकि मैदानी जिलों में 45-46 सीटें हो सकती हैं।
“33 प्रतिशत महिला आरक्षण के बाद 93 सीटों में पहाड़ों के पास सिर्फ 32-33 सीटें बचेंगी। इससे अलग राज्य के लिए हुआ संघर्ष निरर्थक हो जाएगा,” उन्होंने कहा।
संस्कृति, भाषा और पर्यावरण पर संकट
मगांई ने कहा कि गढ़वाली-कुमाऊंनी को आज तक राजभाषा का दर्जा नहीं मिला। युवा मातृभाषा भूल रहे हैं। पहाड़ों में शराबखोरी बढ़ रही है और महिलाएं ‘नशा नहीं रोजगार दो’ आंदोलन चला रही हैं।
उन्होंने चिपको आंदोलन की धरती पर ही जंगलों की अंधाधुंध कटाई, वन्यजीवों के हमले, पर्यावरण क्षरण और तीर्थ स्थलों पर कूड़े-कचरे की समस्या उठाई।
भू कानून और ग्रीन बोनस की मांग
मगांई ने हिमाचल की तर्ज पर सख्त भू कानून, मूल निवास कानून और संविधान की पांचवीं अनुसूची लागू करने की मांग की। साथ ही अधिक वन क्षेत्र होने के कारण उत्तराखंड को ‘ग्रीन बोनस’ दिए जाने की वकालत की।
आयोजन में मौजूद रहे कई आंदोलनकारी
कार्यक्रम में सेवानिवृत्त आईएएस डॉ. सुरेंद्र सिंह पांगती, ‘प्यारा उत्तराखंड’ के संपादक देव सिंह रावत, सेवानिवृत्त नौसेना अधिकारी पीसी थपलियाल, सुलोचना भट्ट, विजय सत्ती, लक्ष्मी थपलियाल, प्रकाश सुमन ध्यानी, मोहन सिंह ‘उत्तराखंडी’ सहित कई वरिष्ठ आंदोलनकारी और जनसरोकार कार्यकर्ता उपस्थित रहे।
देव सिंह रावत का आरोप
उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी संगठनों के संयोजक देव सिंह रावत ने कहा कि हुक्मरानों ने जानबूझकर गैरसैंण राजधानी, भू कानून, मूल निवास, मुजफ्फरनगर कांड के दोषियों को सजा, रोजगार और घुसपैठ जैसे मुद्दों पर कार्रवाई नहीं की, ताकि उत्तराखंड हिमाचल की तरह आत्मनिर्भर न बन सके।
